एमएलएफएफ टेंडर विवाद: स्काईलार्क और श्री साई ने हाईकोर्ट के निर्णय तक प्रक्रिया रोकने की उठाई मांग

एमएलएफएफ टेंडर विवाद: स्काईलार्क और श्री साई ने हाईकोर्ट के निर्णय तक प्रक्रिया रोकने की उठाई मांग

कंपनियों का दावा: कड़ी पात्रता शर्तों ने सीमित की प्रतिस्पर्धा, स्वतंत्र जांच और संभावित ₹500 करोड़ से अधिक राजस्व हानि की मांग उठी

नई दिल्ली: 154 दिल्ली सीमा प्रवेश बिंदुओं पर एमएलएफएफ प्रणाली लागू करने के लिए एमसीडी द्वारा जारी निविदा प्रक्रिया को लेकर स्काईलार्क इंफ्रा इंजीनियरिंग प्रा. लि. और श्री साई एंटरप्राइजेज एंड डेवलपर्स प्रा. लि. ने दिल्ली सरकार का दरवाजा खटखटाया है। दोनों कंपनियों ने अलग-अलग प्रतिनिधित्व सौंपते हुए मुख्यमंत्री से मांग की है कि दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय तक टेंडर प्रक्रिया स्थगित रखी जाए और इस बीच किसी भी प्रकार का लेटर ऑफ अवार्ड (LoA) जारी न किया जाए।

दोनों कंपनियों ने अपने प्रतिनिधित्व में कहा है कि दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित रिट याचिका W.P.(C) No. 8368/2026 में निविदा की पात्रता शर्तों की वैधानिकता, निष्पक्षता और संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। मामले की अंतिम सुनवाई पूरी हो चुकी है और न्यायालय ने अपना निर्णय सुरक्षित रखा है। ऐसे में न्यायिक निर्णय आने से पहले टेंडर प्रक्रिया को अंतिम रूप देना सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े कर सकता है।

प्रतिनिधित्वों के अनुसार, निविदा में ऐसी पात्रता शर्त शामिल की गई, जिसके तहत किसी भी बोलीदाता के लिए एक ही अनुबंध के अंतर्गत लगातार दो वर्षों तक 122 टोल लेन संचालित करने का अनुभव अनिवार्य किया गया। कंपनियों का दावा है कि इस शर्त के कारण पूरे देश में केवल तीन कंपनियां ही तकनीकी रूप से पात्र रह गईं, जिससे प्रतिस्पर्धा सीमित हो गई। उनका यह भी कहना है कि एमसीडी ने अपनी पूर्व की एक निविदा में इसी शर्त को अत्यधिक प्रतिबंधात्मक मानते हुए हटा दिया था, जबकि वर्तमान परियोजना के दायरे में कोई ऐसा महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हुआ है, जिससे इसे दोबारा लागू करना आवश्यक हो।

दोनों कंपनियों ने अपने प्रतिनिधित्व में दिल्ली विजिलेंस विभाग और केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) से इस पूरी निविदा प्रक्रिया, पात्रता शर्तों के निर्धारण और खरीद प्रक्रिया की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग भी की है। उनका कहना है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि पूरी प्रक्रिया प्रतिस्पर्धी, पारदर्शी और सार्वजनिक हित के अनुरूप रही है या नहीं।

स्काईलार्क ने अपने प्रतिनिधित्व में दावा किया है कि उसकी वित्तीय बोली ₹1,057.77 करोड़ थी, जबकि वर्तमान H-1 बोली ₹963.99 करोड़ की है, जिसके बीच लगभग ₹469 करोड़ का अंतर है। कंपनी का कहना है कि यदि पात्रता शर्तें अधिक व्यापक और प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने वाली होतीं, तो अधिक योग्य कंपनियां भाग ले सकती थीं और नगर निगम को ₹500 करोड़ से अधिक अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होने की संभावना थी।

मुख्य मांगें

दोनों कंपनियों ने दिल्ली सरकार से आग्रह किया है कि—

  • दिल्ली उच्च न्यायालय के अंतिम निर्णय तक एमएलएफएफ निविदा प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए।
  • न्यायालय का फैसला आने तक किसी भी प्रकार का लेटर ऑफ अवार्ड जारी न किया जाए।
  • पूरे मामले की स्वतंत्र जांच दिल्ली विजिलेंस विभाग और केंद्रीय सतर्कता आयोग से कराई जाए।
  • आवश्यकता पड़ने पर वर्तमान निविदा को निरस्त कर निष्पक्ष, पारदर्शी एवं गैर-प्रतिबंधात्मक पात्रता शर्तों के साथ नई निविदा जारी की जाए।
  • सार्वजनिक हित, अधिकतम प्रतिस्पर्धा और सरकारी राजस्व की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं।

दोनों कंपनियों ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य किसी विशेष बोलीदाता पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक खरीद प्रणाली में पारदर्शिता, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, समान अवसर और सार्वजनिक हित को सुनिश्चित करना है। उनका कहना है कि हजारों करोड़ रुपये के सार्वजनिक संसाधनों से जुड़ी परियोजनाओं का आवंटन ऐसी प्रक्रिया के माध्यम से होना चाहिए, जो संविधान के मूल सिद्धांतों, विधि के शासन और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के मानकों पर पूरी तरह खरी उतरती हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *