नई दिल्ली: भारत के लोकतांत्रिक भविष्य में युवाओं की भूमिका क्या होगी और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में युवा किस तरह योगदान दे सकते हैं? इन्हीं महत्वपूर्ण विषयों पर दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित ‘आचारशाला’ के दौरान चर्चा हुई।
दिल्ली विश्वविद्यालय के डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर कार्यालय द्वारा कला संकाय के टैगोर ऑडिटोरियम में आयोजित इस कार्यक्रम का विषय ‘युवा, लोकतंत्र और भारत का भविष्य’ था। कार्यक्रम में करीब 140 विद्यार्थियों और 20 शिक्षकों ने भाग लिया।
भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में निदेशक एवं आई.एफ.एस. अधिकारी श्री नितिन प्रमोद कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहे। दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रमुख प्रो. भारतेंदु पांडेय विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर प्रो. रंजन कुमार त्रिपाठी ने की।
मुख्य संबोधन में श्री नितिन प्रमोद ने कहा कि मजबूत लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र प्रेस और जागरूक नागरिक बेहद आवश्यक हैं। उन्होंने भारत के विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में चल रहे प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि सुशासन, शिक्षा, बुनियादी ढांचा और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी देश की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने युवाओं को भ्रष्टाचार के प्रति सजग रहने और रोजमर्रा की जिंदगी में दिखाई देने वाले गलत कार्यों का विरोध करने के लिए प्रेरित किया। इसके साथ ही उन्होंने विद्यार्थियों से भूगोल और भू-राजनीति की समझ बढ़ाने का आह्वान किया, ताकि वे राष्ट्रीय और वैश्विक घटनाक्रम को बेहतर ढंग से समझ सकें।
वर्ष 2047 तक भारत को विश्वगुरु बनाने के लक्ष्य पर बात करते हुए श्री नितिन प्रमोद ने कहा कि देश का भविष्य केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि आज की पीढ़ी की सोच, दृष्टि और कार्यों से तय होगा।
वहीं, प्रो. भारतेंदु पांडेय ने भारतीय शास्त्रीय बौद्धिक परंपराओं और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने विद्यार्थियों को आत्म-विकास, अनुशासन और समाज तथा राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। ‘आचारशाला’ ने दिल्ली विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को लोकतंत्र, राष्ट्र निर्माण और भारत के भविष्य जैसे विषयों पर विशेषज्ञों के विचारों को समझने का अवसर प्रदान किया।
