चैत्र नवरात्रि 2026 के नौवें दिन 27 मार्च को माँ सिद्धिदात्री की पूजा और महानवमी मनाई जाती है। जानें अष्ट सिद्धियों की कथा, पूजा विधि, मंत्र, कन्या पूजन और पारण का सही तरीका।
नई दिल्ली: पहले दिन से लेकर आज तक — शैलपुत्री की दृढ़ता, ब्रह्मचारिणी की तपस्या, चंद्रघंटा का साहस, कूष्मांडा की रचनाशक्ति, स्कंदमाता की ममता, कात्यायनी की वीरता, कालरात्रि का तेज और महागौरी की शुद्धता — यह सफर आज माँ सिद्धिदात्री के चरणों में पूरा होता है।
चैत्र नवरात्रि 2026 का नौवाँ दिन यानी 27 मार्च, शुक्रवार को महानवमी का यह पवित्र दिन उस देवी को समर्पित है जो सिद्धियों की दाता हैं, जिन्होंने खुद भगवान शिव को वो शक्ति दी थी जिससे यह पूरा ब्रह्मांड बना। आज सच्चे मन से माँगी हर मुराद पूरी होती है।
कौन हैं माँ सिद्धिदात्री ?
पुराणों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में जब कुछ भी नहीं था — न धरती, न आसमान, न जीव — तब भगवान शिव ने आदिशक्ति की आराधना की ताकि सृष्टि रचने की शक्ति मिल सके। तब माँ सिद्धिदात्री शिव के बाईं ओर से प्रकट हुईं — यही अर्धनारीश्वर का रूप है। उन्होंने शिव को आठों सिद्धियाँ प्रदान कीं जिससे पूरी सृष्टि का निर्माण संभव हुआ।
सोचिए — जो देवी खुद भगवान शिव को सिद्धियाँ देती हैं, वो अगर अपने भक्त पर प्रसन्न हों तो क्या नहीं दे सकतीं? माँ सिद्धिदात्री नवरात्रि की साधना की वह चाबी हैं जो हर बंद दरवाजा खोल देती है।
क्या होती हैं अष्ट सिद्धियाँ?
माँ सिद्धिदात्री आठ प्रमुख सिद्धियों की दाता हैं जिन्हें अष्ट सिद्धि कहते हैं। ये हैं — अणिमा यानी सूक्ष्म रूप धारण करने की शक्ति, महिमा यानी विशाल रूप लेने की शक्ति, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व। सांसारिक भाषा में कहें तो माँ की कृपा से भक्त को वो सब मिलता है जो उसके जीवन के लिए जरूरी है — ज्ञान, बल, सफलता, मोक्ष और मन की पूर्ण शांति।
कैसा है माँ सिद्धिदात्री का दिव्य स्वरूप?
माँ सिद्धिदात्री कमल के फूल पर विराजमान हैं और उनकी आभा सुनहरी और शांत है। उनकी चार भुजाएँ हैं — एक हाथ में शंख जो दिव्य ध्वनि और शुभता का प्रतीक है, एक में चक्र जो सुरक्षा देता है, एक में गदा जो शक्ति का प्रतीक है और एक में कमल जो आत्मिक शुद्धता दर्शाता है।
उनका चेहरा इतना करुणामयी है कि जो भी सच्चे मन से उनके सामने आता है, खाली हाथ नहीं जाता। वे सहस्रार चक्र की अधिष्ठात्री हैं — यानी उनकी कृपा से आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है।
क्या मिलता है माँ सिद्धिदात्री की पूजा से ?
नौ दिन की साधना का फल आज माँ सिद्धिदात्री की कृपा से पूरा मिलता है:
मनोकामनाएँ पूरी होती हैं और जीवन में सफलता का रास्ता खुलता है। अज्ञान और भ्रम दूर होता है, बुद्धि तेज होती है। आत्मिक शांति, समृद्धि और हर तरह की रुकावटों से मुक्ति मिलती है। जो भक्त पूरे नौ दिन नवरात्रि की साधना करते हैं, उन्हें माँ सिद्धिदात्री विशेष आशीर्वाद देती हैं। मोक्ष और परमात्मा से जुड़ाव का सबसे पवित्र द्वार आज खुलता है।
नौवें दिन की पूजा विधि
सुबह जल्दी उठें, स्नान करें और बैंगनी यानी पर्पल रंग के कपड़े पहनें — यह रंग आत्मिक शक्ति, रहस्य और दिव्य ज्ञान का प्रतीक है।
कलश को विसर्जन की तैयारी के साथ सजाएँ। माँ को कमल के फूल अर्पित करें — यह उनका सबसे प्रिय है। तिल, तिल के लड्डू, खीर, हलवा-पूरी-चना, नारियल की मिठाई, फल, दूध और शहद भोग में रखें। घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ।
फिर पूरे भाव से यह मंत्र 108 बार जपें:
“ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः”
इसके बाद यह स्तुति पढ़ें:
“सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि । सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ॥”
या फिर यह पढ़ें:
“या देवी सर्वभूतेषु मां सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥”
महानवमी पर कन्या पूजन जरूर करें
आज का दिन कन्या पूजन के लिए सबसे विशेष है। नौ कन्याओं को घर बुलाएँ जो नवदुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक हैं। उनके पाँव धोएँ, माथे पर तिलक करें और प्रेम से हलवा-पूरी-चना का भोजन कराएँ। लाल चुनरी, मिठाई और यथाशक्ति दक्षिणा देकर उनसे आशीर्वाद लें। माँ खुद इन्हीं कन्याओं के रूप में आपके घर पधारती हैं — इस बात को मन में रखकर पूजा करें।
पारण का सही तरीका — ऐसे तोड़ें नौ दिन का व्रत
पूजा और कन्या भोजन के बाद व्रत का पारण करें। पहले माँ को भोग लगाएँ, फिर कन्याओं को भोजन कराएँ और उसके बाद खुद प्रसाद ग्रहण करें। आज रामनवमी भी है इसलिए दिन बेहद शुभ और दोहरे उत्सव का है। पारण में सात्विक भोजन लें और दिन का समापन दान-पुण्य के साथ करें।
