चैत्र नवरात्रि 2026 के पाँचवें दिन 23 मार्च को माँ स्कंदमाता की पूजा होती है। जानें कार्तिकेय की माँ की कथा, पूजा विधि, मंत्र, कौन सा भोग चढ़ाएँ और किस रंग के कपड़े पहनें।
नई दिल्ली: चैत्र नवरात्रि 2026 का पाँचवाँ दिन यानी 23 मार्च, सोमवार — नवदुर्गा की पाँचवीं शक्ति को समर्पित है जो भगवान कार्तिकेय की माँ हैं। उनकी पूजा करने से घर में शांति आती है, बच्चों की रक्षा होती है और जीवन में माँ की ममता जैसी कोमलता और ताकत दोनों एक साथ मिलती हैं।
माँ स्कंदमाता कौन हैं?
पुराणों के अनुसार, असुर तारकासुर को वरदान था कि उसका वध सिर्फ शिव-पार्वती के पुत्र के हाथों ही होगा। इसीलिए देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव और देवी पार्वती के यहाँ कार्तिकेय यानी स्कंद का जन्म हुआ। कार्तिकेय की माँ होने के कारण देवी पार्वती का यह रूप “स्कंदमाता” कहलाया।
इस रूप में माँ अपने छोटे से बालक कार्तिकेय को प्यार से गोद में लिए बैठी हैं — लेकिन उनके चेहरे पर एक माँ की वो शक्ति भी है जो अपने बच्चे पर आँच आने पर पूरी दुनिया से टकरा सकती है। माँ स्कंदमाता हमें सिखाती हैं कि ममता कमजोरी नहीं होती — वो सबसे बड़ी ताकत होती है।
कैसा है माँ स्कंदमाता का दिव्य स्वरूप?
माँ स्कंदमाता कमल के फूल पर विराजमान हैं या कभी-कभी सिंह पर सवार दिखाई देती हैं। उनकी चार भुजाएँ हैं — ऊपर के दोनों हाथों में कमल के फूल हैं जो पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक हैं। एक हाथ में छोटे से कार्तिकेय को प्यार से थामे हुए हैं और दूसरे हाथ से वे अभयमुद्रा में हैं यानी भक्तों को कह रही हैं — “डरो मत, मैं हूँ।”
उनका चेहरा इतना शांत और ममतामयी है कि बस देखते ही मन हल्का हो जाता है। उनकी सुनहरी आभा और शांत मुस्कान हर भक्त को यह एहसास दिलाती है कि वो एकदम सुरक्षित है।
माँ स्कंदमाता की पूजा से क्या मिलता है?
माँ स्कंदमाता की कृपा जीवन के हर पहलू को छूती है:
मन की बेचैनी और डर दूर होते हैं, खासकर बच्चों की परेशानियाँ खत्म होती हैं। संतान सुख चाहने वाले दंपतियों की मनोकामना पूरी होती है। घर में सुख-शांति और आपसी प्रेम बढ़ता है। रुके हुए काम बनते हैं और जीवन में बुद्धि और विवेक आता है। मन शुद्ध होता है और आत्मिक उन्नति का रास्ता खुलता है।
पाँचवें दिन की पूजा विधि
ब्रह्म मुहूर्त में उठें, स्नान करें और सफेद या पीले रंग के कपड़े पहनें — ये रंग पवित्रता, खुशी और मातृ ऊर्जा के प्रतीक हैं।
कलश को ताजे जल और फूलों से सजाएँ। माँ को केले का भोग जरूर लगाएँ क्योंकि यह उनका सबसे प्रिय भोग है। पीले फूल, खीर, दूध की मिठाई, फल और शहद भी अर्पित करें। घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ।
फिर श्रद्धा से यह मंत्र 108 बार जपें:
“ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः”
इसके बाद यह स्तुति पढ़ें:
“सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया । शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी ॥”
या फिर यह पढ़ें:
“या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥”
परिवार के साथ माँ की ममता और कार्तिकेय की कथा सुनाएँ। आरती करें और अगर संभव हो तो किसी बच्चे की मदद करें या दान करें — माँ को यह बेहद प्रिय है।
इस दिन सुबह की पूजा का है खास महत्व
माँ स्कंदमाता की पूजा ब्रह्म मुहूर्त यानी सुबह 4 से 6 बजे के बीच करने से सबसे ज्यादा फल मिलता है। इस समय वातावरण शुद्ध होता है और माँ की कृपा सीधे मन तक पहुँचती है।
