नई न्यूरो-डेवलपमेंटल रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि social media के बढ़ते उपयोग से बच्चों की एकाग्रता क्षमता घट रही है और ADHD जैसे लक्षणों का खतरा बढ़ रहा है।
11 दिसंबर 2025, नई दिल्ली
इंटरनेट और स्मार्टफोन ने दुनिया को जोड़ने का काम जरूर किया है, लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू धीरे-धीरे सामने आ रहा है। हाल ही में एक न्यूरो-डेवलपमेंटल रिपोर्ट में पाया गया है कि फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट जैसे social media प्लेटफॉर्म बच्चों के मानसिक विकास पर गहरा असर डाल रहे हैं। लगातार स्क्रॉलिंग, रील्स और नोटिफिकेशंस के कारण बच्चों की कंसंट्रेशन पावर तेजी से कमजोर होती जा रही है।
रिसर्च में सामने आए चौंकाने वाले नतीजे
अमेरिका में किए गए एक बड़े अध्ययन में हजारों बच्चों को शामिल किया गया। रिसर्च में पाया गया कि जो बच्चे घंटों तक social media या डिजिटल स्क्रीन पर समय बिताते हैं, उनमें ध्यान भटकने, बेचैनी और अतिसक्रियता जैसे लक्षण ज्यादा दिखाई देते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि ये संकेत ADHD की ओर इशारा करते हैं, जो एक न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसऑर्डर है।
क्या है ADHD?
ADHD यानी Attention Deficit Hyperactivity Disorder—इसमें बच्चा लंबे समय तक किसी काम पर टिककर ध्यान नहीं दे पाता। वह एक जगह बैठने में असहज महसूस करता है और लगातार हलचल या बेचैनी प्रदर्शित करता है। स्टडी में बताया गया कि social media प्लेटफॉर्म्स की तेज रफ्तार और लगातार मिलने वाली सूचनाएँ बच्चों में इन लक्षणों को और मजबूत कर देती हैं।
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स्क्रीन टाइम से ज्यादा खतरनाक है एप्स का डिजाइन
शोधकर्ताओं ने बच्चों की दैनिक डिजिटल आदतों का मूल्यांकन भी किया। दो से तीन घंटे टीवी देखने वाले, लंबे समय तक वीडियो गेम खेलने वाले और लगातार social media स्क्रॉल करने वाले बच्चों में ADHD जैसे लक्षण अधिक दिखे।
रिपोर्ट बताती है कि समस्या सिर्फ स्क्रीन टाइम की नहीं है—बल्कि एप्स का स्ट्रक्चर, नोटिफिकेशन अलर्ट, अनंत स्क्रॉलिंग और लगातार आने वाले अपडेट्स बच्चों के मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को विचलित करते हैं।
नोटिफिकेशंस: फोकस के सबसे बड़े दुश्मन
स्वीडन के Karolinska Institute और Oregon Health & Science University द्वारा की गई संयुक्त रिसर्च में पाया गया कि नोटिफिकेशन बच्चों के फोकस को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। अचानक आने वाला एक अलर्ट बच्चे के दिमाग को उसके काम से हटाकर सीधे स्क्रीन की ओर खींच लेता है। प्रोफेसर टॉर्केल क्लिंगबर्ग का कहना है कि सोशल मीडिया का दिमाग पर हस्तक्षेप अन्य डिजिटल मीडिया से कहीं अधिक तीव्र होता है।
उम्र के साथ बढ़ रहा है सोशल मीडिया का दबाव
स्टडी के अनुसार 9 साल की उम्र में बच्चे प्रतिदिन लगभग 30 मिनट सोशल मीडिया पर बिताते हैं, जबकि 13 की उम्र तक यही समय बढ़कर करीब 2.5 घंटे हो जाता है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि ज्यादातर प्लेटफॉर्म्स पर अकाउंट बनाने की न्यूनतम उम्र 13 वर्ष तय है, लेकिन बच्चे इससे पहले ही इसके प्रभाव में आना शुरू कर देते हैं।
माता-पिता के लिए चेतावनी
रिसर्च का स्पष्ट संदेश है—बच्चों को डिजिटल दुनिया से पूरी तरह दूर करना संभव नहीं है, लेकिन निगरानी और संतुलन बेहद जरूरी है। social media का बढ़ता दबाव बच्चों की ध्यान क्षमता और मानसिक स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए डिजिटल समय का सही प्रबंधन अब हर माता-पिता की प्राथमिक जिम्मेदारी बन गया है।
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Suditi Raje has a background in investigative journalism, with a career spanning over 6 years. As part of the Jankiawaz team, she are committed to exposing the truth and bringing to light the stories that matter most.
