Chaitra Navratri दिन 1: माँ शैलपुत्री की पूजा से होती है नवरात्रि की शुरुआत, जानें कथा, मंत्र और पूजा विधि

Chaitra Navratri दिन 1 माँ शैलपुत्री की पूजा से होती है नवरात्रि की शुरुआत, जानें कथा, मं�

चैत्र नवरात्रि के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा होती है। जानें माँ शैलपुत्री कौन हैं, उनकी कथा क्या है, पूजा कैसे करें और कौन से मंत्र जपें।

नई दिल्ली: चैत्र का महीना आते ही पूरे भारत में एक अलग ही भक्ति का माहौल छा जाता है। घरों में घंटियाँ बजने लगती हैं, मंदिरों में भीड़ बढ़ जाती है और हर तरफ “जय माता दी” के जयकारे गूँजने लगते हैं।

नवरात्रि के इस पहले दिन, यानी प्रतिपदा को, माँ दुर्गा के पहले स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। नवदुर्गा की यह पहली शक्ति हमारी आस्था की नींव रखती हैं और हमें भीतर से मजबूत बनाती हैं। तो आइए जानते हैं — माँ शैलपुत्री कौन हैं, उनकी कथा क्या है, पूजा कैसे करें और उनके आशीर्वाद से क्या मिलता है।

माँ शैलपुत्री कौन हैं?

माँ शैलपुत्री का नाम दो शब्दों से बना है — शैल यानी पर्वत और पुत्री यानी बेटी। वे पर्वतराज हिमावत (हिमालय) और माता मेना की पुत्री हैं। इसीलिए उन्हें पर्वत की बेटी कहा जाता है। उनके दूसरे नाम हैं — पार्वती, भवानी और हेमावती।
पर लेकिन इनसे पहले का जन्म भी है इनका, अपने पहले जन्म में वे माँ सती थीं — भगवान शिव की पत्नी, जब उनके पिता राजा दक्ष ने शिव जी का अपमान किया तो माँ सती ने यज्ञ की अग्नि में खुद को समर्पित कर दिया। इसके बाद उन्होंने शैलपुत्री के रूप में पुनर्जन्म लिया और भगवान शिव से दोबारा मिलन हुआ। यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति और प्रेम कभी नष्ट नहीं होते।

माँ शैलपुत्री का स्वरूप और प्रतीक

माँ शैलपुत्री का रूप बेहद मनमोहक और शक्तिशाली है। उनकी छवि देखते ही मन को शांति मिल जाती है —

  • वाहन: सफेद बैल नंदी — जो शक्ति और धर्म का प्रतीक है
  • दाहिने हाथ में: त्रिशूल — जो सुरक्षा और शक्ति का प्रतीक है
  • बाएँ हाथ में: कमल का फूल — पवित्रता और भक्ति का संकेत
  • मस्तक पर: अर्धचंद्र — शीतलता और संयम का प्रतीक
  • वस्त्र: पीले, नारंगी या लाल रंग के

माँ शैलपुत्री मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। यही वह ऊर्जा केंद्र है जो हमें जमीन से जोड़ता है, स्थिरता देता है और डर को दूर करता है।

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कैसे करें माँ शैलपुत्री की पूजा ?

नवरात्रि के पहले दिन की शुरुआत घटस्थापना से होती है। आइए जानें पूरी पूजा विधि सरल भाषा में —
घटस्थापना: सुबह स्नान करके एक मिट्टी के बर्तन में मिट्टी भरें, उसमें जौ या नवधान्य के बीज बोएँ। ऊपर कलश रखें जिसमें जल, आम के पत्ते, नारियल और अन्य शुभ चीजें हों। यह कलश नौ दिनों तक माँ की उपस्थिति का प्रतीक रहता है।
पूजन सामग्री: घी का दीपक जलाएँ, ताजे फूल चढ़ाएँ, कुमकुम, मिठाई और फल अर्पित करें।
मंत्र जाप: माँ के इस मंत्र का 108 बार जाप करें —

ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः

प्रार्थना: यह सुंदर प्रार्थना गाएँ —

वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥

इसके बाद वार कथा पढ़ें और आरती करें। जो लोग उपवास नहीं रख सकते, वे सात्विक भोजन करें और सच्चे मन से प्रार्थना करें।
दिन का रंग: पीला या नारंगी — ये रंग उत्साह और पवित्रता के प्रतीक हैं।

क्या मिलता है माँ शैलपुत्री से ?

माँ शैलपुत्री की पूजा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है — इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। उनकी उपासना से —

  • जीवन में स्थिरता और मानसिक शांति आती है
  • परिवार में एकता और वैवाहिक जीवन में मधुरता बढ़ती है
  • नकारात्मक ऊर्जा और बुरे ग्रहों का प्रभाव कम होता है
  • नई शुरुआत करने का साहस मिलता है
  • भीतर की शक्ति जागती है और आत्मविश्वास बढ़ता है

कहते हैं कि जो भक्त पहले दिन पूरी श्रद्धा से माँ शैलपुत्री की पूजा करता है, उसके नवरात्रि के बाकी आठ दिन भी सुंदर और फलदायी होते हैं।

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