उत्तराखंड की 5 प्रमुख जनजातियां: पांडवों के वंशज से लेकर बनरावत तक, जानिए उनकी अनोखी संस्कृति और इतिहास

उत्तराखंड की 5 प्रमुख जनजातियां: पांडवों के वंशज से लेकर बनरावत तक, जानिए उनकी अनोखी संस्कृति और इतिहास

उत्तराखंड की पांच प्रमुख जनजातियों की संस्कृति, जीवनशैली, लोक परंपराएं और इतिहास को जानिए। पढ़िए जौनसारी, थारू, भोटिया, बुक्सा और राजी समुदायों की विशेषताएं।

नई दिल्ली: भारत में अनुसूचित जनजातियों की बात करें तो 700 से अधिक आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त जनजातीय समूह हैं। पिछली जनगणना के अनुसार 705 अलग-अलग जनजातियों को मान्यता प्राप्त है और ये जनजातियां भारत की कुल आबादी का लगभग 8.6 प्रतिशत हिस्सा हैं। आज हम उत्तराखंड में रहने वाली पांच प्रमुख अनुसूचित जनजातियों की बात करेंगे। इनमें कुछ समुदाय खुद को महाभारत के पांडवों का वंशज मानते हैं, तो कुछ को जंगलों का राजा यानी बनरावत कहा जाता है।

जौनसारी

सबसे पहले बात उत्तराखंड के सबसे बड़े जनजातीय समूह जौनसारी की। जौनसारी समुदाय मुख्य रूप से देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में रहता है। जौनसारी समाज में यह लोकमान्यता प्रचलित है कि उनका संबंध महाभारत के पांडवों से रहा है। पहले इस समाज में बहुपति विवाह, अर्थात एक महिला का एक से अधिक भाइयों से विवाह करने की प्रथा थी।

शिक्षा, आधुनिक कानून और सामाजिक बदलावों के कारण यह प्रथा अब लगभग समाप्त हो चुकी है। इनके प्रमुख त्योहारों में बिस्सू, जागड़ा और माघ मेला शामिल हैं, जिन्हें बड़े उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। हारुल और बारदा नाटी जौनसारी संस्कृति के प्रसिद्ध लोक नृत्य हैं।

थारू

उत्तराखंड का दूसरा बड़ा जनजातीय समूह थारू है, जो मुख्य रूप से ऊधमसिंह नगर के तराई क्षेत्रों में निवास करता है। इस समुदाय की अपनी अलग संस्कृति, पहचान और परंपराएं हैं, जो इसे अन्य समुदायों से अलग बनाती हैं। थारू समाज में महिलाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।

वे परिवार, खेती और सामाजिक कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इस समुदाय की आजीविका मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन पर आधारित है। वर्तमान समय में शिक्षा के प्रसार के साथ थारू समाज के लोग विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं। थारू समुदाय अपने त्योहारों, लोकगीतों और लोककथाओं के लिए जाना जाता है तथा उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भोटिया

भोटिया उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियों में से एक है। यह समुदाय पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में निवास करता है। भोटिया समुदाय के लोग सर्दियों में बर्फबारी के दौरान निचली घाटियों में आ जाते हैं और गर्मियों में फिर ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लौट जाते हैं।

1962 के भारत-चीन युद्ध से पहले भोटिया लोग तिब्बत के साथ ऊन, नमक और अन्य वस्तुओं का व्यापार करते थे। इनके द्वारा बनाए गए शॉल, कालीन, कंबल और अन्य ऊनी वस्त्र काफी प्रसिद्ध हैं। भोटिया समुदाय की कई उप-शाखाएं हैं, जिनमें जोहारी, तोलछा, मार्छा और जाड़ प्रमुख हैं। यह जनजाति उत्तराखंड की सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बुक्सा

बुक्सा समुदाय मुख्य रूप से नैनीताल और आसपास के तराई-भाबर क्षेत्रों में निवास करता है। इस समुदाय में यह मान्यता प्रचलित है कि उनके पूर्वज राजस्थान के चित्तौड़गढ़ से आए थे, हालांकि इसके स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। बुक्सा समाज में सामाजिक और पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए एक पारंपरिक पंचायत होती है, जिसे ‘तखत’ कहा जाता है।

बुक्सा समुदाय के लोग मां बाल सुंदरी और अन्य स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। काशीपुर स्थित बाल सुंदरी मंदिर इनके प्रमुख आस्था केंद्रों में से एक है। बुक्सा जनजाति अपनी सादगी, मेहनत और पारंपरिक संस्कृति के लिए जानी जाती है।

राजी

राजी उत्तराखंड की सबसे छोटी जनजातियों में से एक है। यह जनजाति मुख्य रूप से पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों के जंगलों तथा सीमावर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में रहती है। कम आबादी और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों के कारण भारत सरकार ने इस जनजाति को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) की श्रेणी में रखा है।

पुराने समय में राजी लोग स्थानीय लोगों के साथ मूक व्यापार करते थे। वे अपनी बनाई हुई वस्तुएं एक स्थान पर रख देते थे और बदले में अनाज या अन्य जरूरी सामान ले लेते थे।

इस प्रक्रिया के दौरान दोनों पक्ष आमने-सामने नहीं आते थे। राजी समुदाय को बनरावत भी कहा जाता है, क्योंकि पहले ये लोग जंगलों में रहकर शिकार, कंदमूल और वन उत्पादों पर निर्भर रहते थे।आज राजी समुदाय शिक्षा और आधुनिक सुविधाओं से जुड़ रहा है, लेकिन अपनी पारंपरिक संस्कृति को भी सहेजकर रखे हुए है।

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