चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है। जानिए उनका स्वरूप, पौराणिक कथा, पूजा विधि और मंत्र — और समझिए क्यों उनकी भक्ति जीवन में धैर्य और सफलता देती है।
नई दिल्ली: 20 मार्च 2026 चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। ये वही देवी हैं जिन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की — भूखी रहीं, धूप-बारिश सहा, और अपनी इच्छाशक्ति से देवताओं को भी चकित कर दिया। उनकी कहानी आज भी हमें सिखाती है कि अगर इरादा पक्का हो, तो कोई भी मुश्किल रास्ता नहीं रोक सकती।
कौन हैं माँ ब्रह्मचारिणी?
माँ ब्रह्मचारिणी असल में देवी पार्वती का वो रूप हैं जब वे अविवाहित थीं और शिवजी को पाने के लिए घोर साधना में लगी थीं। “ब्रह्मचारिणी” का मतलब होता है — वो जो ब्रह्म की राह पर चले, यानी तपस्या, संयम और भक्ति को अपना जीवन बना ले।
पिछले जन्म में वे सती थीं। सती के देह त्याग के बाद, हिमावत की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लेकर उन्होंने फिर से शिवजी को वरण करने की ठान ली। इसके लिए उन्होंने हजारों साल तक ऐसी तपस्या की जो आज भी अद्भुत मानी जाती है। एक पैर पर खड़ी रहीं, कड़ाके की ठंड और तेज धूप सहते हुए। पहले फल-फूल खाए, फिर सूखे पत्ते, और अंत में वो भी छोड़ दिए — इसीलिए उनका नाम “अपर्णा” भी पड़ा यानी जो पत्ता भी न खाए।
उनकी इस साधना से इंद्र सहित सभी देवता दंग रह गए, और अंततः भगवान शिव भी उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी स्वीकार करने पर राजी हो गए। इसी दिव्य मिलन से आगे चलकर कार्तिकेय का जन्म हुआ, जिन्होंने तारकासुर का वध किया।
सादगी में छुपी माँ का असली स्वरूप
माँ ब्रह्मचारिणी का रूप उतना ही शांत और सौम्य है जितना उनका स्वभाव। वे सफेद वस्त्र धारण करती हैं — जो पवित्रता और वैराग्य की निशानी है। नंगे पांव चलती हैं, कोई भारी-भरकम आभूषण नहीं। उनके दाहिने हाथ में जपमाला है — जो इस बात का प्रतीक है कि मन हमेशा ईश्वर में लगा रहे। बाएं हाथ में कमंडलु है — जो आत्मनिर्भरता और संयम का संकेत देता है। उनका चेहरा इतना शांत और तेजस्वी है कि देखते ही मन को सुकून मिल जाता है।
क्या मिलता है माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा से ?
माँ ब्रह्मचारिणी की भक्ति सिर्फ धार्मिक कर्मकांड नहीं है — ये एक आंतरिक बदलाव की शुरुआत है। उनकी कृपा से —
- मन में धैर्य और दृढ़ता आती है
- पढ़ाई और करियर में सफलता मिलती है
- मन के विकार और कमजोरियां दूर होती हैं
- जो लोग अच्छे जीवनसाथी की तलाश में हैं, उन्हें उनका आशीर्वाद मिलता है
- कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं टूटती
- और आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति मिलती है
दूसरे दिन की पूजा विधि
सुबह जल्दी उठें, स्नान करें और हरे रंग के कपड़े पहनें — ये दिन का शुभ रंग है, जो विकास और ताजगी का प्रतीक है।
पहले दिन स्थापित किए गए कलश की देखभाल करें, ताजे फूल और जल अर्पित करें। माँ को सफेद फूल (चमेली या कमल), मिश्री, मिठाई, दूध, शहद और पंचामृत का भोग लगाएं। घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएं।
मंत्र जाप करें: – ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः
इसे रुद्राक्ष की माला से कम से कम 108 बार जपें।
स्तुति पढ़ें-
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
परिवार के साथ माँ की तपस्या की कथा सुनाएं और आरती करें। व्रत रखने वाले फल, दूध और सात्विक भोजन ग्रहण करें। जप, ध्यान और दान इस दिन विशेष फलदायी माने जाते हैं।
माँ ब्रह्मचारिणी से प्रार्थना करें — आलस्य, संदेह और कमज़ोरी को दूर करने के लिए। उनकी कृपा से हर छोटी कोशिश भी एक दिन बड़ा फल देती है — ठीक वैसे, जैसे उनकी तपस्या ने उन्हें शिव से मिलाया।
