सिर्फ 0.2% आबादी होने के बावजूद यहूदी समुदाय का दुनिया पर बड़ा प्रभाव है। जानिए अब्राहम से इज़राइल तक 4000 साल पुराने यहूदियों के इतिहास, Abrahamic Religions और उनकी विरासत की कहानी
नई दिल्ली: एक ऐसे धर्म के लोग, जो संख्या में कम होने के बावजूद दुनिया भर में अपना प्रभाव रखते हैं। चाहे बात करें महान अल्बर्ट आइंस्टीन, मार्क ज़ुकरबर्ग और नेटली पोर्टमैन की, ये तीनों ही अपने-अपने क्षेत्र के दिग्गज माने जाते हैं। ये सभी यहूदी धर्म से आते हैं।
इस धर्म को मानने वालों की संख्या विश्वभर में लगभग 1.5 करोड़ है, जो विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 0.2 प्रतिशत है। यहूदी धर्म की जड़ें ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म से भी जुड़ी हुई हैं। इन तीनों धर्मों को Abrahamic Religions कहा जाता है, जिनमें यहूदी धर्म को सबसे पुराना माना जाता है।
अब्राहम से इज़राइल तक: 4000 साल पुराने यहूदी इतिहास की रोचक यात्रा
यहूदियों का इतिहास लगभग 4000 वर्ष पुराना माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसकी शुरुआत अब्राहम (Abraham) से होती है, जिनका जन्म प्राचीन मेसोपोटामिया में हुआ था, जो कि आज का इराक कहा जाता है । माना जाता है कि वे लगभग 2000 से 1800 ईसा पूर्व के बीच जीवित थे। हालांकि, इसके स्पष्ट ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
उनकी सबसे बड़ी पहचान यह थी कि उन्होंने एक ईश्वर में विश्वास का संदेश दिया, जबकि उस समय अधिकांश लोग कई देवी-देवताओं की पूजा करते थे। यही विचार आगे चलकर यहूदी धर्म की पहचान बना।
यहूदी धर्म: Abrahamic Religions की सबसे पुरानी कड़ी
अब्राहम के पुत्र इसहाक (Isaac) और उनके पुत्र याकूब (Jacob) को यहूदी इतिहास में विशेष स्थान है। याकूब को बाद में “इज़राइल” नाम दिया गया। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, उनका ईश्वर के एक दूत के साथ संघर्ष हुआ था, जिसके बाद उन्हें यह नाम मिला। आगे चलकर उनके 12 पुत्र हुए।
समय के साथ उनके परिवार बड़े होते गए और अलग-अलग समूहों में बंट गए। इन समूहों को इस्राएल की बारह जनजातियाँ (Twelve Tribes of Israel) कहा गया। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, बाद में ये लोग मिस्र में जाकर बस गए थे। लेकिन वहाँ उन्हें गुलाम बना लिया गया। तब पैगंबर मूसा (Moses) ने उनका नेतृत्व किया और उन्हें गुलामी से बाहर निकाला।
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इस घटना को “एक्सोडस (Exodus)” कहा जाता है। इसी दौरान मूसा को ईश्वर के दस आदेश (Ten Commandments) प्राप्त हुए, जो आज भी यहूदियों की प्रमुख शिक्षाओं में शामिल हैं। लगभग 1000 ईसा पूर्व में इस्राएलियों ने अपना राज्य स्थापित किया। राजा दाऊद (David) ने यरूशलम (Jerusalem) को राजधानी बनाया।
उनके पुत्र सुलैमान ने वहाँ पहला पवित्र मंदिर बनवाया, जो यहूदियों के लिए सबसे पवित्र स्थान बन गया। कुछ समय तक सब कुछ शांतिपूर्ण रहा, लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक नहीं रही। 586 ईसा पूर्व में बाबुल की सेना ने यरूशलम पर हमला कर दिया और मंदिर को नष्ट कर दिया। इसके बाद बड़ी संख्या में यहूदी अलग-अलग देशों में जाकर बस गए। इस बिखराव को “डायस्पोरा (Diaspora)” कहा जाता है।
हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के बाद भी भेदभाव
दुनिया के विभिन्न देशों में बसे यहूदियों ने व्यापार, शिक्षा, विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। हालांकि, उन्हें कई बार भेदभाव और उत्पीड़न का सामना भी करना पड़ा। इसी बीच यहूदी धर्म से ही ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म का विकास हुआ।
ईसाई धर्म के अनुयायी यीशु मसीह (Jesus Christ) को ईश्वर का पुत्र मानते हैं। वहीं लगभग छह सौ वर्ष बाद इस्लाम धर्म का उदय हुआ। इस्लाम में इब्राहीम (Abraham), मूसा (Moses) और ईसा (Jesus) को पैगंबर माना जाता है। यही कारण है कि इन तीनों धर्मों के बीच कई ऐतिहासिक और धार्मिक संबंध दिखाई देते हैं।
होलोकॉस्ट से इज़राइल तक
20वीं शताब्दी यहूदियों के लिए सबसे कठिन समय लेकर आई। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी में एडोल्फ हिटलर के नेतृत्व में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई। यह मानव इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक मानी जाती है, जिसे होलोकॉस्ट (Holocaust) कहा जाता है।
होलोकॉस्ट के बाद यहूदियों के लिए एक अलग देश की मांग तेज हो गई। आखिरकार 14 मई 1948 को इज़राइल राष्ट्र की स्थापना हुई। इसके बाद दुनिया भर से लाखों यहूदी वहाँ जाकर बसने लगे। आज इज़राइल दुनिया भर के यहूदियों के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और सांस्कृतिक केंद्र माना जाता है।
