ऑटिज्म स्टेम सेल थेरेपी मामले में माता-पिता की सुप्रीम कोर्ट से मौखिक सुनवाई की मांग

ऑटिज्म स्टेम सेल थेरेपी मामले में माता-पिता की सुप्रीम कोर्ट से मौखिक सुनवाई की मांग

5,000 परिवारों का प्रतिनिधित्व करने वाले फोरम ने कहा- पहले से इलाज करा रहे बच्चों के लिए स्पष्ट विकल्प जरूरी

नई दिल्ली: ऑटिज्म और सेरेब्रल पाल्सी से प्रभावित बच्चों के परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट से स्टेम सेल थेरेपी मामले में मौखिक सुनवाई का मौका देने की मांग की है। माता-पिता ने कहा कि अदालत को उनके अनुभवों, क्लिनिकल रिकॉर्ड और वैज्ञानिक शोध पर भी विचार करना चाहिए।

पैरेंट्स फोरम फॉर स्टेम सेल्स इन ऑटिज्म एंड सेरेब्रल पाल्सी ने आंध्र भवन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी मांग रखी। फोरम करीब 5,000 परिवारों का प्रतिनिधित्व करता है।

फोरम ने सुनवाई में पक्ष रखने का मौका मांगा

फोरम ने बताया कि वह यश चैरिटेबल ट्रस्ट एंड अन्य बनाम भारत संघ एंड अन्य मामले में प्रतिवादी है।

संगठन के अनुसार, जनवरी 2025 में मामले की पहली सुनवाई के दौरान उसके वकील ने मौखिक रूप से अपनी बात रखने की अनुमति मांगी थी। फोरम का कहना है कि अदालत ने उसे लिखित दलीलें देने को कहा।

अब संगठन सुप्रीम कोर्ट से मौखिक सुनवाई की मांग कर रहा है।

बच्चों के मौजूदा उपचार पर उठे सवाल

फोरम के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले में ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नियमित उपचार के तौर पर जारी नहीं रखने की बात कही गई है। फोरम ने कहा कि फैसले में पहले से उपचार ले रहे बच्चों को क्लिनिकल ट्रायल करने वाले संस्थानों की ओर भेजने का निर्देश भी है।

फोरम का कहना है कि इन बच्चों के लिए अभी उपयुक्त क्लिनिकल ट्रायल उपलब्ध नहीं है। माता-पिता ने ऐसे में उपचार की निरंतरता को लेकर चिंता जताई।

उन्होंने यह भी पूछा कि पहले से उपचार ले रहे बच्चे मौजूदा क्लिनिकल ट्रायल की पात्रता शर्तों को पूरा करेंगे या नहीं।

डॉक्टर और माता-पिता ने बताए अनुभव

जबलपुर की डॉ. सीमा मेहरोत्रा ने अपने बच्चे के उपचार के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि स्टेम सेल थेरेपी के बाद उन्होंने बच्चे की चलने-फिरने की क्षमता, संवाद, समझ और दैनिक गतिविधियों में बदलाव देखा।

हैदराबाद की डॉ. संध्या गोकोवरापु ने उपचार जारी रखने को लेकर चिंता जताई।

उन्होंने कहा कि किसी बच्चे का उपचार तब तक बंद करने का फैसला नहीं होना चाहिए, जब तक यह स्पष्ट न हो कि उसके लिए उपयुक्त क्लिनिकल ट्रायल उपलब्ध है और वह उसमें शामिल होने की पात्रता रखता है।

पुणे की 73 वर्षीय दीपाजी ने भी अपने ऑटिज्म से प्रभावित पोते की देखभाल और उपचार से जुड़े अनुभव साझा किए।

82 शोध पत्र अदालत के सामने रखने का दावा

फोरम ने कहा कि उसने अदालत के सामने 82 पीयर-रिव्यू किए गए शोध पत्र पेश किए हैं। इसके अलावा संगठन ने क्लिनिकल रिकॉर्ड, परिवारों के अनुभव और अन्य दस्तावेज भी प्रस्तुत करने की बात कही।

फोरम चाहता है कि अदालत इन सभी सामग्रियों पर विचार करे।

नियामकीय व्यवस्था पर भी सवाल

फोरम ने ऑटोलोगस स्टेम सेल प्रक्रिया के नियमन को लेकर भी सवाल उठाए। इस प्रक्रिया में डॉक्टर मरीज की अपनी कोशिकाएं लेकर उन्हें उसी मरीज के शरीर में वापस पहुंचाते हैं।

संगठन ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940, न्यू ड्रग्स एंड क्लिनिकल ट्रायल्स रूल्स, 2019 और सीडीएससीओ के नियामकीय ढांचे के संदर्भ में मामले की समीक्षा की मांग की।

माता-पिता की क्या मांग है?

अरुण कुमार तिवारी, जो फोरम के उपाध्यक्ष और एक ऑटिस्टिक बच्चे के पिता हैं, ने कहा कि परिवार अदालत से उनकी बात सुनने और उनके द्वारा जमा किए गए साक्ष्यों की जांच करने की मांग कर रहे हैं।

फोरम ने मौखिक सुनवाई, बच्चों के स्वास्थ्य के अधिकार, क्लिनिकल रिकॉर्ड और परिवारों के अनुभवों पर विचार करने के साथ वैज्ञानिक सामग्री की स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है।

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