चैत्र नवरात्रि 2026 के चौथे दिन 22 मार्च को माँ कूष्मांडा की पूजा होगी । जानें उनकी सृष्टि रचना की कथा, पूजा विधि, मंत्र, कौन सा भोग चढ़ाएँ और किस रंग के कपड़े पहनें।
नई दिल्ली: सोचिए एक पल — जब कुछ भी नहीं था। न रोशनी, न आसमान, न धरती, बस घना अंधेरा। तब माँ कूष्मांडा मुस्कुराईं — और उस एक मुस्कान से पूरा ब्रह्मांड जन्म ले गया। चैत्र नवरात्रि 2026 का चौथा दिन यानी 22 मार्च, रविवार — नवदुर्गा की इसी अद्भुत शक्ति को समर्पित है। माँ कूष्मांडा सूर्यमंडल के केंद्र में विराजती हैं और अपनी दिव्य ऊर्जा से सारी सृष्टि को जीवन देती हैं। आज उनकी पूजा करने से घर में स्वास्थ्य, ऊर्जा और सकारात्मकता की बाढ़ आ जाती है।
क्यों है माँ कूष्मांडा का नाम इतना खास ?
“कूष्मांडा” नाम तीन संस्कृत शब्दों से बना है — “कु” यानी छोटा, “उष्मा” यानी ऊष्मा या ऊर्जा, और “अंड” यानी ब्रह्मांडीय अंडा। मतलब साफ है — वो देवी जिनकी दिव्य मुस्कान ने इस छोटे से ऊर्जा के अंडे से पूरी सृष्टि बना दी। इसीलिए उन्हें ब्रह्मांड की रचयिता कहा जाता है।
माँ कूष्मांडा की कथा
पुराणों के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में चारों तरफ सिर्फ अंधकार था। कोई जीव नहीं, कोई प्रकाश नहीं, कोई हलचल नहीं। तब माँ कूष्मांडा ने अपनी अंतरात्मा की गहराई से एक हल्की मुस्कान बिखेरी। बस उसी पल सूरज जला, तारे टिमटिमाए, धरती बनी और जीवन का सिलसिला शुरू हो गया।
वे सूर्यलोक यानी सूर्य के केंद्र में निवास करती हैं और वहाँ से पूरी सृष्टि को ऊर्जा और रोशनी देती रहती हैं। यही वजह है कि उनकी पूजा से शरीर में ताकत, मन में उजाला और जीवन में उत्साह भर जाता है।
कैसा है माँ कूष्मांडा का दिव्य स्वरूप?
माँ कूष्मांडा उगते सूरज जैसी दमकती हैं — सुनहरी आभा, मुस्कुराता चेहरा और सिंह पर सवारी। उनकी आठ भुजाएँ हैं जिनमें कमंडल, कमल, रुद्राक्ष माला, धनुष, बाण, चक्र, गदा और अमृत कलश है।
हर वस्तु का अपना संदेश है — अमृत कलश यानी वे अपने भक्तों को रोग और दुख से मुक्त करती हैं, कमल यानी पवित्रता, धनुष-बाण यानी सटीकता और चक्र-गदा यानी बुराई का नाश। उनकी शांत मुस्कान बताती है कि सच्ची ताकत क्रोध में नहीं, सृजन में होती है।
माँ कूष्मांडा की पूजा से क्या मिलता है?
माँ कूष्मांडा की कृपा से भक्तों के जीवन में बड़े बदलाव आते हैं:
शरीर के रोग और कमजोरी दूर होती है। मन की नकारात्मकता और उदासी छँटती है। आँखों की रोशनी और शरीर की ऊर्जा बढ़ती है। काम-धंधे में सफलता और समाज में अच्छी छवि बनती है। आत्मविश्वास जागता है और भीतर से एक नई रोशनी महसूस होती है।
कहते हैं जो भक्त सच्चे मन से माँ कूष्मांडा की शरण में आता है, उसका जीवन भी उगते सूरज जैसा चमकने लगता है।
चौथे दिन की पूजा विधि
सुबह जल्दी उठें, स्नान करें और नारंगी यानी ऑरेंज रंग के कपड़े पहनें — यह रंग सूर्य की ऊर्जा, उत्साह और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक है।
कलश को ताजे जल, फूल और हल्दी से सजाएँ। माँ को लाल फूल अर्पित करें क्योंकि यह उनका प्रिय है। भोग में मालपुआ, खीर, लड्डू, फल और शहद चढ़ाएँ। कद्दू (कुम्हड़ा) का प्रसाद भी विशेष माना जाता है। घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ।
फिर पूरे मन से यह मंत्र 108 बार जपें:
“ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः”
इसके बाद यह सुंदर स्तुति पढ़ें:
“सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च । दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे ॥”
परिवार के साथ उनकी सृष्टि रचना की कथा सुनाएँ और आरती करें। सूर्य नमस्कार करना भी इस दिन बेहद शुभ माना जाता है।
बीज मंत्र से करें विशेष साधना
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कूष्माण्डायै नमः”
इस चैत्र नवरात्रि माँ कूष्मांडा से यही माँगें — वो उजाला जो अँधेरे से नहीं डरता, वो ताकत जो थकती नहीं, वो मुस्कान जो मुश्किलों में भी टूटती नहीं। माँ ने एक बार पूरा ब्रह्मांड बना दिया था — आपकी तकलीफें दूर करना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं।
