Makar Sankranti पर दही-चूड़ा खाने की परंपरा सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि मौसम परिवर्तन, शरीर संतुलन और सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा एक वैज्ञानिक भोजन है।
13 जनवरी 2026, नई दिल्ली
Makar Sankranti भारत के उन पर्वों में शामिल है, जहां आस्था, मौसम और खानपान एक साथ नया मोड़ लेते हैं। जैसे ही सूर्य उत्तरायण होता है, ठंड के मौसम में शरीर को विशेष देखभाल और ऊर्जा की जरूरत होती है। इसी जरूरत को ध्यान में रखकर सदियों पहले दही-चूड़ा जैसी सादी लेकिन बेहद असरदार भोजन परंपरा विकसित हुई।
खासकर बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति की सुबह दही-चूड़ा के बिना त्योहार अधूरा माना जाता है। यह सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि प्रकृति और शरीर के तालमेल का प्रतीक है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था।
Makar Sankranti 2026 कब मनाई जाएगी?
साल 2026 में Makar Sankranti 14 जनवरी को मनाई जाएगी, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह पर्व 15 जनवरी 2026 को भी मनाया जाएगा। इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तरायण की शुरुआत होती है।
Makar Sankranti पर दही-चूड़ा क्यों खाया जाता है?
दही-चूड़ा को सर्दियों में शरीर को संतुलित रखने वाला पारंपरिक आहार माना जाता है।
- चूड़ा (पोहे) हल्का, सुपाच्य और तुरंत ऊर्जा देने वाला होता है।
- दही पाचन को बेहतर बनाता है और शरीर की आंतरिक गर्मी को नियंत्रित करता है।
- सूर्य के उत्तरायण होते ही शरीर में पित्त बढ़ने लगता है, जिसे दही-चूड़ा प्राकृतिक रूप से संतुलित करता है।
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दही-चूड़ा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
ग्रामीण भारत में दही-चूड़ा को समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है।
Makar Sankranti के दिन इसे गुड़, तिल, मूंगफली और कभी-कभी मौसमी फलों के साथ खाया जाता है, जो जीवन में मिठास, स्थिरता और खुशहाली का संकेत है।
नई फसल के पहले अन्न को देवताओं को अर्पित कर फिर परिवार में बांटना—यही इस परंपरा की आत्मा है।
दही-चूड़ा खाने के स्वास्थ्य लाभ
- पाचन तंत्र को मजबूत करता है
- सर्दियों में शरीर को तुरंत ऊर्जा देता है
- आंतों में अच्छे बैक्टीरिया बढ़ाता है
- गैस और एसिडिटी की समस्या से राहत दिलाता है
- वजन संतुलन बनाए रखने में मददगार
आधुनिक पोषण विज्ञान भी मानता है कि दही और चावल आधारित भोजन प्रोबायोटिक और कार्बोहाइड्रेट का संतुलित संयोजन है, जो शरीर के लिए बेहद फायदेमंद होता है।
यही कारण है कि Makar Sankranti पर दही-चूड़ा न सिर्फ परंपरा, बल्कि सेहत का भी भरोसेमंद साथी है।
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