सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच में सबरीमाला मंदिर प्रवेश मामले की सुनवाई शुरू। जानिए केंद्र सरकार के तर्क, परंपरा बनाम समानता की बहस और फैसले का देशभर पर असर
नई दिल्ली: क्या अदालत को यह तय करने का अधिकार है कि किसी मंदिर में कौन जाए और कौन नहीं? या यह फैसला उस धर्म के मानने वालों पर छोड़ा जाना चाहिए?यही सवाल आज एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत के सामने है — और इस बार फैसला सिर्फ सबरीमाला तक नहीं, बल्कि पूरे देश की धार्मिक परंपराओं को प्रभावित कर सकता है।
सरकार ने साफ कहा — “यह भेदभाव नहीं, परंपरा है”
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में दो टूक कहा है कि सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश न होना किसी भेदभाव पर नहीं, बल्कि सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा पर आधारित है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिए दाखिल इस हलफनामे में सरकार ने कहा कि भगवान अयप्पा नैष्ठिक ब्रह्मचारी हैं — यानी उनकी पूजा-पद्धति का आधार ही ब्रह्मचर्य है। ऐसे में अगर इस परंपरा को तोड़ा गया, तो देवता के स्वरूप और पूजा की पूरी पद्धति ही बदल जाएगी।
सरकार का यह भी कहना है कि यह प्रतिबंध महिलाओं को कमतर समझने की वजह से नहीं लगाया गया — बल्कि यह उस देवता की प्रकृति से जुड़ा नियम है जिनकी वहाँ पूजा होती है।
सुनवाई आज दोपहर तक जारी रही और आने वाले हफ्तों में दोनों पक्षों की पूरी दलीलें सुनी जाएंगी। यह फैसला जब भी आएगा — देश के धार्मिक और कानूनी परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल सकता है।
यह सिर्फ एक मंदिर का मामला नहीं। यह सवाल है कि आस्था और कानून के बीच की लकीर कहाँ खींची जाए — और वह लकीर कौन खींचेगा।
9 जजों की बेंच — इतनी बड़ी पीठ क्यों?
आज मंगलवार, 7 अप्रैल 2026 को सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने इस मामले की सुनवाई शुरू की। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत की अगुआई में यह पीठ इसलिए बनाई गई है क्योंकि यह मामला सिर्फ एक मंदिर का नहीं — यह संविधान के कई बड़े सवालों से जुड़ा है।
इस पीठ में शामिल हैं:
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टाइन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जोयमल्या बागची।
सुनवाई का कार्यक्रम — कब क्या होगा?
यह सुनवाई कई चरणों में होगी:
- 7 से 9 अप्रैल — समीक्षा याचिका दाखिल करने वालों और केंद्र सरकार की दलीलें सुनी जाएंगी
- 14 से 16 अप्रैल — विरोधी पक्ष अपनी बात रखेगा
- 21 अप्रैल — जवाबी दलीलें होंगी
- 22 अप्रैल — अमिकस क्यूरी (अदालत के सहायक वकील) अपनी राय देंगे
सरकार के चार बड़े तर्क, जो अदालत में रखे गए
सरकार ने अपने हलफनामे में मुख्य रूप से चार बातें कही हैं:
- पहली बात — यह पाबंदी उम्र के आधार पर है और भगवान अयप्पा की ब्रह्मचर्य परंपरा से जुड़ी है। इसका महिलाओं की “अशुद्धता” से कोई लेना-देना नहीं।
- दूसरी बात — अदालतें धर्मग्रंथों की व्याख्या करने या यह तय करने की जगह नहीं हैं कि किसी देवता का स्वरूप क्या होना चाहिए।
- तीसरी बात — 2018 का फैसला संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिली धार्मिक स्वायत्तता की अनदेखी करता है।
- चौथी बात — अगर अदालत धार्मिक परंपराओं में दखल देने लगे, तो देश की धार्मिक विविधता खतरे में पड़ सकती है।
क्या हुआ था 2018 में
केरल के सबरीमाला मंदिर में सदियों से यह नियम चला आ रहा था कि 10 से 50 साल की महिलाएं — यानी वे जो मासिक धर्म की उम्र में हों — मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं।
सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने 4-1 के बहुमत से इस पाबंदी को असंवैधानिक घोषित कर दिया। लेकिन उसी बेंच में जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने असहमति जताई और कहा कि यह एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा है जिसमें अदालत को दखल नहीं देना चाहिए।
इस फैसले के बाद केरल में जबरदस्त विरोध हुआ। 50 से ज्यादा समीक्षा याचिकाएं दाखिल हुईं और 2019 में मामला 9 जजों की बड़ी बेंच को सौंप दिया गया।
क्या कह रहे हैं बाकी पक्ष ?
केरल सरकार पहले महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में थी, लेकिन अब उसका रुख नरम हो गया है। अब वह कह रही है कि इस मुद्दे पर धार्मिक विद्वानों और समाज सुधारकों से व्यापक बातचीत के बाद ही कोई निर्णय होना चाहिए।
ट्रावनकोर देवस्वोम बोर्ड — जो मंदिर की देखरेख करता है — ने परंपरा की रक्षा के पक्ष में हलफनामा दाखिल किया है।
महिला भक्त — दिलचस्प बात यह है कि बड़ी संख्या में महिला अयप्पा भक्त भी इस परंपरा को बनाए रखने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि यह उनकी आस्था का हिस्सा है।
यह मामला सिर्फ एक मंदिर का नहीं
यह सुनवाई इसलिए भी बेहद अहम है क्योंकि 9 जजों की यह पीठ जो संवैधानिक सवालों का जवाब देगी, उसका असर कई और धार्मिक समुदायों पर भी पड़ेगा — जैसे पारसी महिलाओं का अग्नि मंदिर में प्रवेश, दाऊदी बोहरा समाज की परंपराएं और ऐसी ही कई अन्य प्रथाएं।
असल में अदालत को यह तय करना है कि संविधान के तीन बड़े अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए:
- अनुच्छेद 14-15 — समानता का अधिकार
- अनुच्छेद 25 — धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता
- अनुच्छेद 26 — धार्मिक संस्थाओं के अपने मामले खुद संभालने का अधिकार
सुनवाई आज दोपहर तक जारी रही और आने वाले हफ्तों में दोनों पक्षों की पूरी दलीलें सुनी जाएंगी। यह फैसला जब भी आएगा — देश के धार्मिक और कानूनी परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल सकता है।
यह सिर्फ एक मंदिर का मामला नहीं। यह सवाल है कि आस्था और कानून के बीच की लकीर कहाँ खींची जाए — और वह लकीर कौन खींचेगा।
