फाल्गुन शुक्ल एकादशी पर मनाई जाने वाली रंगभरी एकादशी 2026 का जानें आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व। काशी में शिव-पार्वती के मिलन उत्सव, Kashi Vishwanath Temple में विशेष पूजा, शुभ मुहूर्त और व्रत पारण की पूरी जानकारी पढ़ें।
नई दिल्ली: फाल्गुन का महीना आते ही देशभर में होली की तैयारियां शुरू हो जाती हैं, लेकिन वाराणसी में इसकी औपचारिक शुरुआत एक खास पर्व से होती है-रंगभरी एकादशी। यह सिर्फ एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि शिव-पार्वती के मिलन और रंगों के स्वागत का प्रतीक उत्सव है।
क्यों खास है रंगभरी एकादशी?
अधिकांश एकादशी व्रत जहां भगवान विष्णु को समर्पित होते हैं, वहीं रंगभरी एकादशी पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। मान्यता है कि विवाह के बाद जब माता पार्वती पहली बार भगवान शिव के साथ काशी आई, तब भक्तों ने उनका रंग-गुलाल से स्वागत किया। इसी परंपरा को आज भी Kashi Vishwanath Temple में बड़े उत्साह के साथ निभाया जाता है।
इस दिन मंदिर में भगवान विश्वनाथ और माता गौरी का विशेष श्रृंगार किया जाता है। रंग और अबीर अर्पित करने के बाद प्रतीकात्मक रूप से नगर भ्रमण भी होता है। स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन होली के आगाज का संकेत होता है।
रंगभरी एकादशी 2026 की तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन शुक्ल एकादशी 27 फरवरी 2026 (शुक्रवार) को मनाई जाएगी। तिथि का प्रारंभ 27 फरवरी को रात 12:33 बजे से होगा और उसी दिन रात 10:32 बजे तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर व्रत और पूजा 27 फरवरी को ही की जाएगी।
पूजा के शुभ समय
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 5:09 बजे से 5:58 बजे तक
सामान्य पूजा का समय: सुबह 6:48 बजे से 11:08 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:11 बजे से 12:57 बजे तक
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन बनने वाले विशेष योग रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, आयुष्मान योग और सौभाग्य योग पूजा को और अधिक फलदायी बनाते हैं।
आध्यात्मिक महत्व और पारण का समय
रंगभरी एकादशी केवल रंग खेलने का दिन नहीं, बल्कि शिव-शक्ति के संगम का प्रतीक है। यह पर्व भक्तों को जीवन में प्रेम, संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है। कई स्थानों पर इस दिन आंवले के पूजन की भी परंपरा है, इसलिए इसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है।
व्रत का पारण 28 फरवरी 2026 को प्रातःकाल किया जा सकता है, हालांकि स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।
काशी में रंगभरी एकादशी का दृश्य आध्यात्मिकता और उत्सव का अद्भुत संगम पेश करता है। जहां भक्ति के साथ रंगों की मस्ती भी जुड़ जाती है। यही वजह है कि इसे होली की असली शुरुआत माना जाता है।
